65 दिनों में टूटा विवाह, 14 वर्षों तक चला मुकदमा

सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय उन लोगों के लिए बड़ी राहत लेकर आया है, जो वर्षों से ऐसे वैवाहिक रिश्तों में फँसे हुए हैं, जिनका वास्तविक जीवन में कोई अस्तित्व नहीं बचा है। यह फैसला केवल एक दंपत्ति के विवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय न्याय प्रणाली की संवेदनशील और व्यावहारिक सोच को दर्शाता है।

यह मामला Neha Lal बनाम Abhishek Kumar से जुड़ा है, जहाँ विवाह तो हुआ, लेकिन पति-पत्नी केवल 65 दिनों तक ही साथ रह सके। इसके बाद जो हुआ, वह था लगभग 14 वर्षों तक चलने वाला कानूनी संघर्ष, जिसने दोनों पक्षों के जीवन को प्रभावित किया।

65 दिन की शादी और वर्षों की मुकदमेबाज़ी

सोचिए, केवल 65 दिनों का वैवाहिक जीवन और उसके बाद 14 साल तक अदालतों के चक्कर। यह केवल एक निजी कहानी नहीं है, बल्कि समाज में बढ़ते वैवाहिक विवादों और लंबी कानूनी प्रक्रियाओं का प्रतिबिंब है।

दोनों पक्षों ने एक-दूसरे के खिलाफ कई मुकदमे दायर किए। फैमिली कोर्ट, मजिस्ट्रेट कोर्ट, हाई कोर्ट और अंततः सुप्रीम कोर्ट तक यह विवाद पहुँचा। लगातार मुकदमेबाज़ी ने न केवल समय और धन की बर्बादी की, बल्कि मानसिक तनाव भी बढ़ाया।

Transfer Petition और Article 142 की भूमिका

इस मामले में पत्नी ने सुप्रीम कोर्ट में Transfer Petition दाखिल की। इसके साथ ही संविधान के Article 142 के अंतर्गत एक अलग आवेदन प्रस्तुत किया गया, जिसमें सीधे विवाह समाप्त करने की मांग की गई।

Article 142 सुप्रीम कोर्ट को यह विशेष शक्ति देता है कि वह पूर्ण न्याय करने के लिए आवश्यक आदेश पारित कर सके। जब सामान्य कानून और प्रक्रियाएँ किसी व्यक्ति को राहत देने में असफल हो जाती हैं, तब यह प्रावधान महत्वपूर्ण बन जाता है।

सुप्रीम कोर्ट ने किन बातों पर विचार किया

सुप्रीम कोर्ट ने केवल आरोप-प्रत्यारोप तक खुद को सीमित नहीं रखा। कोर्ट ने पूरे 14 वर्षों की परिस्थितियों, व्यवहार और मुकदमेबाज़ी के प्रभाव का समग्र मूल्यांकन किया।

कोर्ट ने यह तथ्य महत्वपूर्ण माना कि पति-पत्नी एक दशक से अधिक समय से अलग रह रहे थे, सुलह की सभी कोशिशें विफल हो चुकी थीं और लगातार मुकदमे केवल कटुता को बढ़ा रहे थे।

irretrievably broken marriage पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि जब कोई वैवाहिक रिश्ता पूरी तरह टूट चुका हो, तो उसे ज़बरदस्ती बनाए रखना न्याय नहीं बल्कि अन्याय है। इतने वर्षों की कड़वाहट के बाद साथ रहने की उम्मीद करना अव्यावहारिक है।

इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने Article 142 का प्रयोग करते हुए एक पक्ष की असहमति के बावजूद विवाह को समाप्त कर दिया। यह निर्णय वैवाहिक कानून के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है।

अदालत को battlefield नहीं बनाया जा सकता

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि अदालतें बदला लेने या दबाव बनाने का माध्यम नहीं हैं। अनावश्यक और बार-बार मुकदमे दायर करना न्याय प्रणाली का दुरुपयोग है।

इसी कारण कोर्ट ने दोनों पक्षों पर ₹10,000-₹10,000 का खर्च लगाया, ताकि यह स्पष्ट संदेश जाए कि न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग स्वीकार्य नहीं है।

कौन-से मामले जारी रहेंगे

हालाँकि सुप्रीम कोर्ट ने सभी मामलों को समाप्त नहीं किया। जहाँ झूठे हलफनामे और गलत बयानी जैसे गंभीर आरोप थे, उन मामलों को जारी रखने का निर्देश दिया गया।

कोर्ट का स्पष्ट संदेश था कि शादी समाप्त हो सकती है, लेकिन न्याय प्रक्रिया के साथ धोखा नहीं किया जा सकता।

आम जनता के लिए इस निर्णय का महत्व

यह फैसला उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण है जिनकी शादी केवल काग़ज़ों में रह गई है। यदि पति-पत्नी वर्षों से अलग रह रहे हैं और कोई समाधान नहीं निकल रहा, तो यह निर्णय एक कानूनी रास्ता दिखाता है।

हालाँकि यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि Article 142 हर मामले में लागू नहीं होता। प्रत्येक मामला अपने तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर तय किया जाता है।

Court Marriage और वैवाहिक विवादों में कानूनी सलाह

चाहे मामला Court Marriage से जुड़ा हो, तलाक का हो, matrimonial disputes का हो या Supreme Court litigation का, बिना सही कानूनी सलाह के उठाया गया कदम नुकसानदायक हो सकता है।

Delhi Law Firm ऐसे मामलों को पूरी संवेदनशीलता और गोपनीयता के साथ संभालता है और क्लाइंट की स्थिति के अनुसार उचित कानूनी मार्गदर्शन प्रदान करता है।

निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय यह दर्शाता है कि कानून केवल प्रक्रियाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि मानव गरिमा और व्यावहारिक न्याय को भी महत्व देता है। टूटे रिश्तों में चुपचाप सहते रहना समाधान नहीं है।

कानून रास्ता देता है, बस सही समय पर सही कदम उठाना ज़रूरी होता है।

https://delhilawfirm.news
Helpline: 9990649999, 9999889091